वो इंसान अलग रूप न बदल कर आया होता !

धोखा मैंने उस इंसान से न यूँ खाया होता ,

रहता अगर याद मुझे , लौट के आती ही नहीं !

ए , ज़िंदगी मैंने तुझे यूँ न गवाया होता ।। 


पहले डर लगता था अपमान से । 

अब डर लगने लगा है इंसान से ।। 

इंसान की कोरी शान से ।।। 

पहले डर लगता था अंधकार से ,

पहले डर लगता था अनजान से ,

अब डर लगने लगा है बुझे हुए इंसान से । 

इंसान की कोरी शान से ।। 

पहले डर लगता था झूठे प्यार से ,

पहले डर लगता था हार से ,

अब डर लगने लगा है झूठे इंसान से । 

इंसान की कोरी शान से ।। 

पहले डर लगता था बीड़ी पान से ,

पहले डर लगता था शराब की दुकान से ,

अब डर लगने लगा है शराबी इंसान से । 

इंसान की कोरी शान से।। 

पहले डर लगता था आंधी - तूफान से ,

पहले डर लगता था भूत के प्रकोपभगवान से ,

अब डर लगने लगा है डरावने इंसान से । 

इंसान की कोरी शान से ।। 

पहले डर लगता था शेर की खूंखार से ,

पहले डर लगता था आतंकवाद से ,

अब डर लगने लगा है खूंखारी इंसान से । 

इंसान की कोरी शान से ।। 

-- Garima Kanwar

Thankyou


umeed karti hoon aapko ye kavita pasand aayi hogi.

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